Friday, 8 September 2017

डिज़ाइनर नेता और स्तरहीन पत्रकारिता

डिज़ाइनर नेता और स्तरहीन पत्रकारिता
गौरी लंकेश की हत्या के बाद अवार्ड वापसी गैंग एक बार फिर सक्रिय हो गयी और इस बार कई डिज़ाइनर नेता भी खुलकर मैदान में आ गए और उन्होंने आरएसएस और बेजीपी के आलावा प्रधानमंत्री मोदी को भी सीधे लपेट लिया . दूसरे दिन मुम्बई, दिल्ली और बंगलौर में कैंडिल मार्च हुआ और एक जैसी मोम् बत्तिया जैसे वे एक ही जगह बनी हों और फिल्म के किसी सीन की तरह अनुशासित निर्देशन में प्रदर्शन कारी रोते बिलखते देखने को मिले.                       गौरी जैसे पत्रकार की हत्या निंदनीय है और इसकी जाँच कर अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. उ.प्र.  और बिहार में हाल ही में कई पत्रकारों की न्रशंस हत्या की गयी लेकिन अफ़सोस ! न कोई डिज़ाइनर नेता और न ही कोई मोमबत्ती धारी प्रदर्शन कारी कहीं दिखाई पड़ा . ये भेद क्यों ?


            गौरी लंकेश कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामैय्या की बहुत नजदीकी मित्र थी और उनके राज्य में पोश इलाके में उनकी हत्या की गयी जो बेहद दुखदायी है. जब उन्हें धमकियाँ मिल रही थी और  उनकी जान को खतरा था, तो मुख्यमंत्री ने उन्हें सुरक्षा क्यों नहीं दी ? जिस दिन उनकी हत्या हुई वे मुख्य मंत्री से मिल कर आ रही थी. बताया जाता है कि वे एक गुप्त मिशन पर थी और उनके भाई ने बताया कि ये गुप्त मिशन था कई नक्सली नेताओं को आत्म समर्पण कराना और इसलिए वे कुछ नक्सलियों के निशाने पर थी . किन्तु सिद्धरामैय्या सहित सभी ने देश में बढ़ रही असहिष्णुता और प्रधान मंत्री मोदी को इस ह्त्या का इसका जिम्मेदार बताया . गौरी को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गयी  और पुलिस ने उन्हें सलामी दी.


ओम थानवी, रबीश कुमार और दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने कपडे उतार कर नागिन डांस किया. टी आर पी  को लालाइत कुछ टी वी चैनलों  ने घंटो बहस की और एक छोटी सी साप्ताहिक मैगजीन “गौरी लंकेश” जिसकी कीमत रु. १५ और खरीदार पता नहीं कितने थे, के पत्रकार को राष्ट्रीय हीरो बना दिया. जाहिर है ये मग्जीन बिना पैसे के नहीं चल सकती, इसके श्रोत क्या है ? इसका स्तेमाल एक विशेष विचारधारा जो राष्ट्र भक्तों को कठघरे में खड़ा कर सके , के प्रचार और प्रसार के लिए किया जाता था. गौरी जो वामपंथी थी, को एक बीजेपी नेता के बारे में मिथ्या समाचार प्रकाशित करने के अपराध में अभी हाल ही  में ६ महीने के जेल की सजा सुनाई गयी थी  और वे जमानत पर थीं. वामपंथियों के पास अब सिवाय आडम्बर के और कुछ नहीं बचा है. एक सजायाफ्ता पत्रकार के प्रति एक राजनैतिक दल की इतनी हमदर्दी ... कुछ तो गड़बड़ है .


                    एस आई टी ने संकेत दिए हैं कि उनकी हत्या नक्सलियों ने की हो सकती है . 

लेकिन जो लोग हिट  एंड रन करके चले गए उनका क्या किया जाय ? 

 राजनीति और पत्रकारिता कितना  नीचे गिरेगी ? क्या कोई भविष्य वाणी कर सकता है ?  

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Thursday, 7 September 2017

क्या मोदी सरकार द्वारा उनका कार्यकाल न बढ़ाये जाने का फैसला सही था ?

भारत में भटक रही है रघुराम राजन की आत्मा ......


क्या मोदी सरकार द्वारा उनका कार्यकाल न बढ़ाये जाने का फैसला सही था ?


यों तो रघुराम राजन को रिज़र्व बैंक का गवर्नर पद छोड़े हुए काफी समय हो गया है . पद छोड़ते हुए उन्होने अध्यापन को अपना पसंदीदा कार्य बताया था और इसीलिये जहाँ से आये थे वहीं चले गए थे . अक्सर किसी न किसी बहाने अनचाहे और आवंछित बयान देकर वे भारत में सुर्खिया बटोरते रहते हैं. मुद्दा चाहे नोट बंदी का हो या असहिष्णुता और सहन शीलता का, वे जब बोलते हैं तो उनका दर्द छलकता है . हाल ही में गौरी लंकेश हत्या पर बोलते हुए उन्होंने भारत की आर्थिक प्रगति को सहनशीलता से जोड़ दिया . कई बार उनकी टिप्पड़ी और पी चिदंबरम की टिप्पड़ी में कोइ अंतर नहीं होता है . 


उन्होंने अपने बयानों से सिद्ध कर दिया कि मोदी सर कार द्वारा उनका कार्यकाल न बढ़ाये जाने का फैसला शायद सही फैसला था.


Friday, 25 August 2017

हरियाणा एक छोटा राज्य ....किन्तु ..... बड़े बड़े स्वयम्भू


हरियाणा वैसे तो एक छोटा राज्य है किन्तु स्वयंभू संत महात्माओं की भरमार रही है . .... जेल गए रामपाल और और अब जेल गए बाबा राम रहीम . लोगों की धर्मान्ध श्रद्धा और विश्वाश अपनी जगह है किन्तु कानून का राज्य कायम रखना और लोक कल्याण के काम करते रहना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है . इसमें किसी भी तरह का भेदभाव या वोट बैंक की राजनीति आड़े नहीं आनी चाहिए . 


कल की हिंसक घटनाये और हरियाणा सरकार की भूमिका दोनों कटघरें में हैं . किन्तु कुछ अन्य पहलुओं पर भी विचार किया जाना आवश्यक है .


-जब इस तरह की हिंसा की आशंका बाबा के अनुनायियों से थी तो क्या ये मुकदमा किसी अन्य राज्य में स्थानातरित नहीं किया जाना चाहिए था ?


-जब हरियाना पुलिस और सरकार दोनों भीड़ को नियंत्रित करने में विफल हो चुकी थी और लाखों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी और जब हिंसा जिसमे ३० लोगों की मृत्यु हो चुकी है , की आशंका थी, क्या न्याय निर्णय कुछ दिन के लिए टाला नहीं जा सकता था या रिजेर्व नहीं किया जा सकता था ? जैसे बहुत अन्य मुकदमों में किया जाता है .


-कल सिर्फ यह निर्णय दिया गया कि बाबा दोषी हैं बाकी निर्णय सोमवार को सुनाया जाएगा. क्या सारा निर्णय सोमवार तक रोका नहीं जा सकता था ? कौन सा आसमान टूट पड रहा था ?


- राम रहीम जैसे किसी स्वयम्भू बाबा को अधिकतम ७ वर्ष की सजा देने के लिए ३० लोगों की मौत .. क्या ये ३० निर्दोष लोगों को मृत्यु दंड देना नहीं हैं ?


-क्या जनता की सम्पत्तियां जो बर्बाद की गयी, रोका नहीं जा सकता था ?


-मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री रहते , जो न तो राज्य के लोकप्रिय नेता हैं और न ही उनमे कोई प्रशानिक क्षमता है और जिनका पिछला ट्रेक रिकार्ड ( रामपाल और जाट आन्दोलन ) बेहद ख़राब है , केंद्र सरकार को अत्यधिक सतर्कता नहीं बरतनी चाहिए थी ?


- हरियाणा सरकार के एक मंत्री राम बिलास जो बाबा के बेहद करीब हैं और जो बार बार ये कहते रहें हैं कि सबकुछ शांति से निपट जाएगा, तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए कि वे ऐसा किस बिना पर कह रहे थे ? क्या प्रायोजित हिंसा बाबा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है ?


- बड़े पैमाने पर हुयी हिंसा में मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है , लाइव टेलीकास्ट की अनुमति किसने और क्यों दी ? रिपोर्टर क्रिकेट मैच की तरह कमेंट्री कर रहे थे और लगभग हर चैनल कह रहा था कि उसके रिपोर्टर पर हमला हुआ है उसकी वैन जला दी गयी है जबकि ऐसा था नहीं. सेंसेसन बनाने के लिए कई पत्रकार अपनी गाड़ियों में लेटे हुए सर पकड़ कर बुरी तरह चिल्ला रहे थे और प्रसारण किया जा रहा था कि उनपर धारदार हथियारों से हमला हुआ है. एक टीवी चैनेल का पत्रकार कह रहा था " यहाँ आसपास सरकारी कार्यालय है बहुत गाड़िया खडी हैं आशंका है कि भीड़ यहाँ आग लगाएगी" . और थोड़ी देर बाद वहां आग लगा दी गयी . 


- पूरे ड्रामा में पुलिस की भूमिका मूकदर्शक की रही ऐसा लग रहा था न कोइ लीडरशिप हैं और न ही कोइ सोच . 


- प्रधान मंत्री को चाहिए कि मुख्यमंत्री को तुरंत निकाल बाहर करे वे किसी काम के नहीं हैं . उन्हें, जहाँ से लाये गए थे उसी गोडाउन में जमा करा दे . जितनी देर होगी बीजेपी का उतना ही नुकसान होगा . बहुत संभव है दोबारा बीजेपी हरियाना में तो सत्ता में नहीं आयेगी . 


- केंद्र सरकार को चाहिए कि राज्यों में ऐसे मुख्यमंत्री बने जों कुशल प्रशासक हों, जिनके पास विजन हो और जो तेजी से विकास कार्य करे. वरना साइनिंग इंडिया जैसा हश्र बहुत दूर नहीं . 


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Sunday, 6 August 2017

हिमालय में ट्रेकिंग : फूलों की घाटी (TREKKING TO HIMALAYAS - VALLEY OF FLOWERS)

हिमालय में ट्रेकिंग : फूलों की घाटी (TREKKING TO HIMALAYAS - VALLEY OF FLOWERS)

महाराष्ट्र की शैहाद्री पर्वत श्रखलाओं की कुछ चुनिन्दा पहाडियों में ट्रेकिंग का अभ्यास करने के बाद भारतीय स्टेट बैंक वैश्विक सूचना प्रौद्योगिकी केंद्र मुंबई की हमारी ४० सदस्यीय टीम श्री ऍम महापात्रा उप प्रबंध निदेशक एवं मुख्य सूचना अधिकारी के नेर्तत्व में हिमालय में ट्रेकिंग के लिए फूलों की घाटी उत्तराखंड के लिए रवाना हुई.

पहला दिन – मुम्बई से रुद्रप्रयाग
मुम्बई से देहरादून (१३८० किमी) पहुँचने के बाद एअरपोर्ट से सीधे रुद्रप्रयाग  के लिए गाडियों निकल पड़े . ये दूरी लगभग 160 किमी है जो ५-६ घंटे पूरी होती है. पूरा रास्ता हरियाली से ओतप्रोत है और पहाड़ो और घाटियों के द्रश्य बेहद मनोरम हैं. अनगिनत झरने मन मोह लेते हैं.  रूद्र प्रयाग  में रात्रि विश्राम हेतु रुकते हैं .

दूसरा दिन – रुद्रप्रयाग से घांघरिया
रुद्रप्रयाग  से सीधे जोशी मठ के लिए रवाना हो गए . रास्ते में चाय पान के बाद गोविन्द्घाट और फिर वहा से शुरू हुई ट्रैकिंग. जो यात्रा का आख़िरी पड़ाव जिसे कार से पूरा किया जा सकता है. गोविन्दघाट से  ४ किमी ऊपर एक गाव है जहाँ से ९-१० किमी की चढ़ाई के बाद घाघरिया पहुँचना था . ये चढ़ाई लगातार चलती हुयी ३०४९ मीटर की ऊंचाई पर स्थिति घाघरिया पहुंचती है. हेमकुंड जाने वाले श्रद्धालु भी यहाँ पहुँच कर रुकते हैं. देहरादून से शुरू हुई  ये यात्रा निरंतर मनोरम पहाडियों और घाटियों से होकर गुजरती है और बहुत ही चित्ताकर्षक दृश्यों और प्रकृति का सुंदर चित्रण करती हैं. ये देव भूमि है और इसे ऐसा चित्ताकर्षक होना ही चाहिए. कई जगह भूस्खलन प्रभावित, बहुत खतरनाक रास्तो से गुजरना पड़ा शायद इनमे से बहुत से  मानव निर्मित है और प्रकृति  का अंधाधुन्ध दोहन और दुरुपयोग रेखांकित करते हैं. हमारी टीम ने अनेक जगहों पर रूक कर फोटोग्राफी की. वैसे तो दुनिया में बहुत ऊचे ऊचे पर्वत है लेकिन हिमालय जैसा महान और देव तुल्य कोई भी नहीं कहीं भी नहीं .

घाघरिया जाने के लिए ९ किमी लम्बा  ट्रेकिंग का रास्ता बहुत मुश्किल नहीं पर  बहुत ज्यादा और लगातार चढ़ाई वाला है जो थकान देता  है और लगातार ऑक्सीजन के कम होते लेवल से जल्दी साँस फूलने लगती है . रास्ते के द्रश्य बहुत अच्छे और फोटोजेनिक  है जिनसे थकान दूर हो जाती हैं .

तीसरा दिन – घांघरिया से फूलों की घाटी और वापस घांघरिया
घघरिया से सुबह ६ बजे हमलोग फूलों की घाटी के लिए चल पड़े. बेहद खतरनाक चढ़ाई और छोटे बड़े उखड़े पड़े पत्थरों से मिल कर बना  रास्ता ४ किमी लम्बा है. इस पर सामान्य रूप से चलना दूभर है. हर कदम बहुत सोच समझ कर बढ़ाना होता है और हर कदम पर  ध्यान केन्द्रित करना होता है  अन्यथा जरा सी असावधानी से सैकड़ो / हजारो फीट नीचे गहराई में जा सकते है. पिछली आपदा के समय जो रास्ता था वह तहस नहस हो चुका था इसलिए एक नया रास्ता निकाला  गया है जिसमे पत्थर बहुत नुकीले और ठीक से जमे नहीं है और बहुत सीधी चढ़ाई है कई जगह ७० से ८० डिग्री तक. इसलिए चलना बहुत थकान देता है. 

अनंतोगत्वा हम फूलों की घाटी में सफलता पूर्वक पहुँच गए. लगभग १०००० फीट ऊंचाई पर हिमालय की गोद में ८७-८८ वर्ग किमी मे फ़ैली इस घाटी को १९८२ में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया है. यूनस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित कर रखा है. वास्तव में यहाँ आकर  दिव्यता का अहसास होता है ये देव भूमि का नंदन कानन है. चारो ओर सुंदर फूल, पत्ते, पर्वत की बर्फ से सजी चोटियाँ, निर्झर गिरते झरने, पास से गुजरते बादल और मलायागिरी से  मंद मंद आती सुगन्धित हवाये . इतना प्राकृतिक सौंदर्य कि पलक झपकाने की सुधि  बुध नहीं, चित्त शांत और मन स्थिर हो जाता है . शायद इसीलिये तपस्या के लिए ऋषि मुनि ऐसी ही जगहों का चयन करते रहें होंगे. इस घाटी में हम केवल ३ किमी लम्बी और लगभग १/२ किमी चौड़ी घाटी में घूम सकते हैं .   

ऐसा माना जाता  है हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने  इसी घाटी में आये  थे। चमौली जिले में एक ऐसा भी गाँव बताया जाता है जहाँ के लोग आज भी हनुमान जी के बारे में बात करना या उनकी फोटो देखना तक पसंद नहीं करते. क्योंकि उनके अनुसार हनुमान जी की संजीवनी  के चक्कर में अन्य जडी बूटियों का  बहुत नुकसान हुआ. स्थानीय निवासी इसे परियों और किन्नरों  का  देश समझने के कारण यहाँ आने से कतराते थे. रामायण और अन्य ग्रंथो में नंदन कानन के रूप में इस घाटी का उल्लेख किया गया है . इस घाटी का पता सबसे पहले ब्रिटिश  पर्वतारोही फ्रैंक एस स्मिथ और उनके साथी आर एल होल्डसवर्थ  ने लगाया था इसकी खूबसूरती से प्रभावित होकर स्मिथ ने 1937 में आकर  इस घाटी में काम किया और, 1938 में “वैली ऑफ फ्लॉवर्स” नाम से एक किताब लिखी. फूलों की ये  घाटी  चारो ओर बर्फ से ढके  पर्वतों से घिरी है. फूलों की 500 से भी अधिक प्रजातियां यहाँ पाई जाती हैं जिन्हें विभिन्न उपचारों में औषधियों के रूप में प्रयोग किया जाता है. अनगिनत जडी बूटियों का भंडार यहाँ है . पूरे विश्व में इस तरह सुंदर और उपयोगी की कोई अन्य जगह नहीं है यहाँ तक कि स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रिया सहित  सभी   देशों की प्राक्रतिक सुन्दरता इस के आगे कुछ भी नहीं है . टीम में स्टेट बैंक के बरिष्ठ अधिकारियो, जो विश्व के कई देशों में कम कर चुके और अनेक देशों की यात्रा कर चुके है, का स्पष्ट मानना है कि विश्व में इससे सुंदर कोई जगह नहीं है. और यहाँ आना ..... वास्तव में बहुत ही रोमांचक अनुभव है. अगर आपकी किस्मत अच्छी है तो आपको काले हिमालयन भालू, कस्तूरी हिरण और तितलियों व् पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियां भी देखने को मिल सकती हैं . हमने तितलियाँ  और  पक्षी तो देखे लेकिन भालू, तेंदुए और कस्तूरी हिरन देखने को नहीं मिले. भोजपत्र के वृक्ष रास्ते में आपको मिलेंगे जिन का  प्राचीन समय में लिखने हेतु प्रयोग होता था.  
नवम्बर से मई माह के मध्य घाटी सामान्यतः हिमाच्छादित रहती है। जुलाई एवं अगस्त माह के दौरान एल्पाइन सहित बहुत से फूल खिलते हैं. हैं। हमारी गाइड ने बताया कि यहाँ पाये जाने वाले फूलों में एनीमोनजर्मेनियममार्शगेंदाप्रिभुलापोटेन्टिलाजिउमतारकलिलियमहिमालयी नीला पोस्तबछनागडेलफिनियमरानुनकुलसकोरिडालिसइन्डुलासौसुरियाकम्पानुलापेडिक्युलरिसमोरिनाइम्पेटिनसबिस्टोरटालिगुलारियाअनाफलिससैक्सिफागालोबिलियाथर्मोपसिसट्रौलियसएक्युलेगियाकोडोनोपसिसडैक्टाइलोरहिज्मसाइप्रिपेडियमस्ट्राबेरी एवं रोडोडियोड्रान आदि  प्रमुख हैं। प्रत्येक मौसम में यहाँ अलग तरह के फूल खिलते है पर सबसे अच्छा मौसम जुलाई से सितम्बर का होता है.
हम तय समय के अनुसार फूलों की घाटी से वापस चल दिए और घांघरिया आ गए. शाम को इको डेवलपमेंट कमिटी भ्युन्दर द्वारा घाटी में किये जा रहे स्वच्छता सफाई और जागरूकता अभियान और  सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पर किये गए  प्रस्तुतीकरण देखे. ये गैरसरकारी संगठन घाटी के पर्यावरण संरक्षण में बहुत अच्छा कार्य कर रही है .
चौथा दिन – घांघरिया से औली गाँव
चौथे दिन सुबह हमलोग घांघरिया से वापस  गोविन्दघाट के लिए चल पड़े . लगभग  तीन  घंटे की ट्रेकिंग के बाद हमलोग वापस गोविन्दघाट पहुँच गए. वहां हमारी गाड़िया खडी थी. गोविन्द् घाट  से हमलोग  जोशी मठ पहुंचे और भगवान बद्री विशाल के दशनो के लिए पहुँच गए . मंदिर के कुंड के गर्म पानी में नहाने से सारी थकान दूर हो गयी. दर्शन और पूजन के बाद हमलोग सीमा के अंतिम गाँव माना  पहुंचे जहाँ जहाँ गणेश गुफा , व्यास पीठ के आलावा भीम पुल स्थिति है जो बेहद आकर्षक है . कहते है जब पांडव स्वर्ग जा रहे थे रास्ते में भागीरथ  नदी थी जिसे पार करने के लिए भीम ने एक शिला नदी के ऊपर डाल दी जिसे भीम पुल कहते हैं . यहाँ मोहक झरना है और बेहतरीन दृश्य. और भारत की सीमा  की आखिरी चाय की दुकान . वहां से हमलोग औली गाँव में एक रिसोर्ट में ठहरने के लिए चल पड़े.  औली से नंदा देवी चोटी के आलावा चारो तरफ पर्वत श्रंखलाये दिखाई देती है. प्रकति की बहुत ही  मनमोहक छटाये बिखरी है चारोतरफ.
पांचवा दिन – धुली गाँव से ऋषिकेश
औली में रात्रि विश्राम के बाद सुबह हमलोग ऋषिकेश के लिए चल पड़े और उद्देश्य ये कि परमार्थ आश्रम की आरती देख सकें जो प्राय: ६:३० बजे होती है. पूरे रास्ते मनमोहक घाटियों और वादियों का आनन्द उठाते हुए और कई जगह भूस्खलन और उसके कारण लगे जाम के कारणों को समझते हुए आगे बढ़ते रहे. मै कई बार पर्वतो की यात्रा पर गया हूँ और हर बार कुछ नया पाता हूँ. रास्तों पर चलते हुए पिछली यात्रा में मैंने एक कविता लिखी थी वह याद आ गयी 

रिश्ते प्यार के
और रस्ते पहाड़ के ,
आसान तो बिल्कुल नही होते,
कभी धूपकभी छाव ,
कभी आंधीकभी तूफान,
तो कभी साफ आसमान नहीं होते ।  
थोड़ी सी बेचैनी से
सैलाब उमड़ पड़ते है अक्सर,
आंखे भी निचोड़ी जाय,
तो कभी  आँसू नहीं होते ,  
(पूरी कविता पढने के लिए नीचे दिया लिक क्लिक करें) 

https://shivemishra1.blogspot.in/2013/10/blog-post_2895.html

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छठवां दिन – ऋषकेश में योग और वापसी
अभियान के छठवें दिन हमारा दिन ऋषिकेश के एक प्रतिष्ठित योगाश्रम में योग शिक्षा से शुरू हुआ . हमने ध्यान,योग, और शारीरिक और मानसिक स्वस्थ रहने के विभिन्न  आयाम सीखे. गंगा स्नान के बाद हम लोग मुंबई आने के लिए एअरपोर्ट चल दिए.
कुछ फोटो -----





































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Thursday, 1 December 2016

Cashless Economy Vs Shameless Politics


कैशलेस इकोनोमी सिर्फ एक अवधारणा है, वास्तव में ऐसा अभी तक विश्व में ऐसा कहीं भी संभव नहीं हो सका है और शायद यह संभव हो भी नहीं सकेगा. इसलिए हमेशा प्रयास  होते है “लेस कैश इकोनोमी (Less Cash Economy)”  के शायद वह भारत में वर्तमान नोट बंदी से काफी हद तक संभव हो सकेगा. नंदन नील्करनी ने हाल में ही कहा था कि इ-पेमेंट की दिशा में जिस काम को करने में ६ साल लगते वह अब ६ महीने में हो जायेगा. ऐसा हो रहा है बहुत तेजी से कम से कम शहरों में तो ही रहा है. इसके दूरगामी परिणाम होंगे और तुरंत न सही लेकिन इससे लेस कैश इकोनोमी बनने की गति तेज होगी. जो भी हो, ये सही कि अचानक लिए गए नोट बंदी के  निर्णय से जनता को परेशानी हो  रही है लेकिन ये भी सही है कि जनता सरकार के  इस अटपटे से दिखने वाले कार्य सामान्यतया खुश दिख रही है.


विपक्षी दलों ने नोट बंदी के इस फैसले को विरोध का बहुत गंभीर मुद्दा बनाया हुआ है और संसद से सड़क तक विरोध कर रहे हैं. इसका परिणाम ये हो रहा है कि धीरे धीरे जनता भी इन परेशानियों को  मानसिक रूप से वास्तविकता से कहीं अधिक समझाने लगी है. योजना लागू करने में कमिया हो सकती हैं और हैं भी लेकिन क्या विरोध का तरीका इतना सतही होना चाहिए कि जो विपक्षी दल भारत बांध में शामिल न हों उन्हें गद्दार कहा जाय. 

हद तो तब हो गयी जब ममता बनेर्जी ने सेना के नियमित कार्ययोजनाओं को पशिम बंगाल में सैन्य विद्रोह की संज्ञा दी और कहा कि सेना लूट कर रही है. पता नहीं वे पश्चिम बंगाल को एक देश समझती है और खुद को वहां की महारानी. आखिर राज्य में सैन्य विद्रोह की क्या जरूरत ? किसी मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने के लिए तो राज्यपाल ही काफी है. सबसे हास्यापद बात तो ये कि उन्होंने आरोप लगाया कि ममता  के प्लेन को कलकत्ता में उतरने में देर की गयी और इससे उनकी जान को खतरा हो सकता था. हर बड़े एअर पोर्ट पर व्यस्त समय में विमान को आसमान में इन्तजार करना पड़ता है और ये समय १५ से ३० मिनट का हो सकता है. मै  स्वयं भी कल मुम्बई एअरपोर्ट पर रात  १० बजे जेट की उड़ान में था जिसे आसमान में लग्न्हाग २० मिनट इन्तजार करना पड़ा.  इंडिगो के  विमान जिसमें ममता जी थीं उनके अतरिक्त लगभग १०० अन्य यात्री थे. क्या ममता की जान पर  ख़तरा करने के लिए १०० अन्य यात्रियों की जान केंद्र सरकार के इशारे पर ली  जा सकती है ? पता नहीं राजनैतिक गिरावट की अंतिम सीमा क्या होगी ?
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शिव प्रकाश मिश्रा 
http://lucknowtribune.blogspot.in


Friday, 13 May 2016

बिहार का आगाज ........ क्या सचमुच आ गया आ गया जंगलराज....?



बारहवीं क्लास में पढ़ने वाले एक 19 वर्षीय छात्र आदित्य सचदेवा की बिहार में हत्या इसलिए की गयी क्योंकि उसने माफिया डॉन बिंदी यादव और सत्तारुढ़ दल की विधान परिषद सदस्य मनोरमा देवी के बेटे रॉकी यादव की कार को ओवरटेक करने की गुस्ताखी  की थी, जो अछम्य थी. शायद लोग सही कहते थे “ओवरटेक न करना बिहार में वरना गोली पड़ेगी कपार में ” इस घटना के बाद मेंरे एक मित्र ने अपनी मारुति कार  के पीछे लिख लिया है “जगह मिलने पर तुरन्त पास दिया जायेगा, कृपया गोली न मारें ”  आदित्य सचदेवा के परिजनों का करुण क्रंदन दिल को दहला देने वाला है और इसने  जन आक्रोश को जन्म दिया है किंतु सत्तारूढ़ दल इसे समझ नहीं सका है और, उप मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री सहित इसके  नेता  अनाप-शनाप और अनावश्यक बयान दे  रहे हैं जिससे न केवल सरकार की बल्कि समूचे बिहार की छवि खराब हो रही है और लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि  शायद जंगलराज का आगाज हो रहा है.  हो सकता है इसमें थोड़ी अतिश्योक्ति हो या राजनातिक विद्वेष की भावना हो. किन्तु  सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा खासतौर से उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और वाज जले पर नमक छिड़कने जैसा है . यह सत्ता का अहंकार है और यह अंग्रेजों के जमाने की  उस मानसिकता से भी खराब है जिसमें भारतीय अंग्रेजों के बराबर खड़े नहीं हो सकते थे अंग्रेजों के साथ ट्रेन में यात्रा नहीं कर सकते थे और  सड़कों पर चल नहीं  सकते थे.

बिहार की वर्तमान सरकार में लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी पार्टी है और इसके पास 80 विधायक हैं नीतीश कुमार जो मुख्यमंत्री हैं उनके पास केवल ७१  विधायक हैं और उनकी पार्टी दूसरे नंबर की पार्टी है. किसी भी गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी का प्रतिनिधि सरकार का मुखिया होता है किंतु चुनाव से पहले लालू यादव ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी पार्टी 80 सीटें प्राप्त कर बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनेगी.  शायद इसीलिए उन्होंने नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता मानकर चुनाव प्रचार किया था और सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे और उन्होंने ऐसा  किया भी.  लेकिन चुनाव के बाद  दोनों पार्टियों में एक अंदुरुनी सहमत बन गई थी कि जब तक लालू यादव का  बच्चा लोग ट्रेनिंग करेंगे तब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे और जैसे ही बच्चा लोगों की ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी, नीतीश कुमार बड़े गठबंधन के  मुखिया बनकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करेंगे. लालू प्रसाद यादव उन्हें समर्थन देंगे. हालाकि नितीश ने अपने लिए पार्टी के अध्यक्ष का पद पहले से ही शरद यादव से लेकर अपने पास रख लिया है . आप देखेंगे कि इस प्रकरण में अचानक उप मुख्यमंत्री और लालू के बेटे तेजस्वी यादव की भूमिका बहुत महत्व पूर्ण हो गयी है. उन्होंने सामने आकर कई बयान दिए और यह जताने की कोशिश की इस सरकार में दबदबा किस पार्टी का है इस पूरे प्रकरण में नितीश कुमार नेपथ्य में चले गए और बताया गया कि वह वाराणसी में, जो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र है वहां पर कोई रैली को संबोधित कर रहे हैं. हो सकता है किसी नैतिक आधार का सहारा लेकर स्तीफा भी दे दे लेकिन फिर सुशासन का क्या होगा ....?
शिव प्रकाश मिश्रा
लखनऊ ट्रिब्यून  http://lucknowtribune.blogspot.in ,
लखनऊ सेन्ट्रल  http://lucknowcentral.blogspot.in  तथा

हम हिन्दुस्तानी http://mishrasp.blogspot.in में एकसाथ प्रकाशित 

Friday, 15 April 2016

शाहरुख का फिर ऊल जलूल बयान


फिल्म स्टार शाहरुख खान ने इंडिया टीवी के प्रोग्राम जनता की अदालत”   के एक प्रोग्राम में, जिसका प्रसारण कल शनिवार को किया  जाना है,  रजत शर्मा के सवालों का जवाब देते हुए अपने पिछले असहिष्णुता के बयान पर बहुत सफाई दी. ये  कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि यह सफाई उनकी आगामी फिल्म फेनके रिलीज होने के उपलक्ष में की गई है. अपने परिवार के देशभक्त होने के दावे को मजबूत करते हुए और  अपनी स्थिति  साफ करते  करते उन्होंने एक बहुत लंबा, बेतुका और हास्यापद दावा कर दिया कि उनसे बड़ा देशभक्त हिंदुस्तान में कोई नहीं है.

हिंदुस्तान का सबसे बड़ा देशभक्त  होने का दावा इतना मूर्खतापूर्ण है के इससे उनकी मानसिक स्थित का पता चलता है. अपने दावे से उन्होंने  125 करोड़ की जनसंख्या वाले  हिंदुस्तान में सबको अपने से छोटा कर दिया. इससे कम से कम इतना  संदेह तो  हो ही गया कि वे पूरे देशभक्त तो नहीं हैं या फिर उनमे बुदधि  और विवेक की काफी कमी है . इससे ये भी सिद्ध होता है कि परदे का हीरो असल जिन्दगी में जीरो भी हो सकता है.

 एक बहुत सामान्य जानकारी का व्यक्ति भी बहुत आसानी से  समझ सकता है कि उनके बयान में कितना अहंकार है और शायद इसी अहंकार की वजह से पिछली बार  दर्शकों ने उनका मानमर्दन किया था. सोशल मीडिया पर उनकी बहुत भद्द  हुई थी. लोगों ने उनकी फिल्मों का बायकाट करना शुरू किया था और इसका बहुत नुकसान  उनको भुगतना पड़ा था. इसके लिए उन्होंने पूरी जनता से माफी भी मांगी थी लेकिन फिर भी अपनी आगामी फिल्म को ध्यान में रखते हुए नुकसान की भरपाई को पूरा करने के लिए जानबूझ कर सफाई दी. और तो और इंडिया टीवी के रजत शर्मा ने आज दिनांक १५ अप्रैल को शो टेलीकास्ट होने के एक दिन पहले ही इस प्रोग्राम के चुनिन्दा अंश  प्राइम टाइम के प्रोग्राम आज की बात जो मूलत: समाचारों का कार्यक्रम हैमें विस्तार से दिखाए. प्रोग्राम के शुरू के १० मिनट में सिर्फ शाहरुख़ खान की शहनाई बजाई गयी. कल १६ अप्रैल को शाहरुख़ की फिल्म रिलीज हो रही है और आज का ये प्रचार  सयोंग नहीं हो सकता. हालाकि शाहरुख़ खान विभिन्न चैनलों पर और विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में जाते रहे हैं.

ईश्वर ऐसे सभी लोगो को सद्बुद्धि दे जिससे वह सच्चे देशभक्त बनने का प्रयाश कर सकें.
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                              -शिव प्रकाश मिश्र